नैमिषारण्य, घने वनों से आच्छादित एक पवित्र भूमि है, जो अनगिनत तपस्वियों की साधना का साक्षी रहा है। ऐतिहासिक रूप से यह हिंदू संस्कृति की जननी मानी जाती है, जिसकी जड़ें वेदों, पुराणों और रामायण-महाभारत जैसे महाकाव्यों में गहराई से समाई हुई हैं। यह वन वेदवाद, कर्मवाद, उपासना वाद और ज्ञान वाद जैसी विविध सांस्कृतिक और दार्शनिक धाराओं के विकास का केंद्र रहा है।प्राचीन काल में नैमिषारण्य भारत के दो महान वनों में से एक था, जिसके उत्तर में हिमालय स्थित है। यही वह स्थान है जहाँ महर्षि वेदव्यास ने वेदों को पुराणों के रूप में संकलित कर आम जनमानस के लिए सुलभ बनाया। इस कारणवश नैमिषारण्य आज वैश्विक स्तर पर एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित है।यह स्थान 88,000 ऋषियों की तपस्या का साक्षी रहा है, जिन्होंने यहाँ आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए साधना की। एक अत्यंत पूजनीय कथा महर्षि दधीचि की है, जिन्होंने असुरों के विनाश हेतु अपने अस्थियों का बलिदान इसी भूमि पर दिया था। उनकी इस महान आहुति की स्मृति में प्रत्येक वर्ष "फाल्गुन अमावस्या परिक्रमा" का आयोजन होता है, जो 84 किलोमीटर लंबी होती है और अमावस्या से प्रारंभ होकर पूर्णिमा को मिश्रित (मिश्रित तीर्थ) पवित्र स्थल पर सम्पन्न होती है, जहाँ विभिन्न तीर्थों का जल एकत्र होता है।तुलसीदासजी रामचरितमानस में लिखते हैं:
“तीरथ बर नैमिष विख्याता, अति पुनीत साधक सिद्धि दाता”
(रामचरितमानस)"सत्यनारायण कथा" जैसी प्रसिद्ध धार्मिक कथा का मूल भी नैमिषारण्य में ही हुआ था, जिसे आज भी भारत के कोने-कोने में श्रद्धापूर्वक सुनाया जाता है। यहाँ दस हजार दिनों तक चलने वाले एक अद्वितीय यज्ञ का आयोजन हुआ था, जिसे आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि जो साधक नैमिषारण्य में ध्यान लगाते हैं, उन्हें अपनी आध्यात्मिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है।गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी रामचरितमानस में नैमिषारण्य की प्रशंसा एक प्रमुख तीर्थ के रूप में की है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह स्थान आध्यात्मिक केंद्र के रूप में कितना महत्वपूर्ण है। यह माना जाता है कि यहाँ आने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और यह स्थान समस्त तीर्थों का प्रतिनिधि माना गया है। वामन पुराण में उल्लेख है कि नैमिषारण्य में 30,000 तीर्थ समाहित हैं, जो पापों का नाश करने की क्षमता रखते हैं।
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