नैमिष – भारतीय धर्मग्रंथों में इसका महत्व

नैमिष – भारतीय धर्मग्रंथों में इसका महत्व

 22 May, 2025.

नैमिषारण्य भारतीय धर्मग्रंथों में एक अत्यंत पवित्र और दिव्य स्थल के रूप में वर्णित है, जिसे प्राचीन काल से ही श्रद्धा और सम्मान प्राप्त है। कूर्म पुराण में उल्लेख है कि नैमिषारण्य सतयुग की शुरुआत से अस्तित्व में रहा है और कलियुग तक यह धार्मिक केंद्र बना हुआ है। इसकी पवित्रता को चक्रतीर्थ से जोड़ा गया है, जहाँ माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा द्वारा निर्मित दिव्य चक्र ने इस स्थान को पावन क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया।देवी भागवत में वर्णन आता है कि जब कलियुग के प्रभाव से भयभीत ऋषि-मुनियों ने ब्रह्माजी के आदेश पर नैमिषारण्य में एकत्र होकर साधना प्रारंभ की, तो वे एक दिव्य चक्र का अनुसरण करते हुए वहाँ पहुँचे, जहाँ वह चक्र भूमि से टकराया। वहीं पर चक्रतीर्थ की स्थापना हुई। वह चक्र पृथ्वी में समा गया और वहाँ से पवित्र जल की धारा फूट पड़ी, जिससे नैमिषारण्य को कलियुग के दोषों से मुक्त स्थान माना गया।"कलिकल विभीतस्मो नैमिषारण्य वासिनाथ, ब्रह्मणात्र समादिष्टं चक्रं दत्वा मनोरमम्"
(देवी भागवत)"नैमिषारण्य" नाम का अर्थ भी स्वयं में दिव्य हस्तक्षेप की शक्ति को दर्शाता है, जैसा कि वराह पुराण में बताया गया है। यह माना जाता है कि ईश्वर ने यहाँ एक क्षण के अंश में असुर शक्तियों का नाश किया, जिससे इस स्थान की पवित्रता और भी अधिक सिद्ध होती है।यह स्थान आज भी आध्यात्मिकता की शक्ति से परिपूर्ण है, जहाँ कलियुग की अशुद्धियाँ टिक नहीं सकतीं और श्रद्धालुओं को एक अद्वितीय दिव्य अनुभूति होती है।नैमिषारण्य आज भी एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल बना हुआ है, जहाँ पूजा, अनुष्ठान और ध्यान की परंपराएं सदियों से निरंतर चली आ रही हैं, जैसा कि अनेकों धर्मग्रंथों में वर्णित है।

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